इस नग्नता का क्या करना है....??

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  • Saturday, May 15, 2010
  • इस अखबार में अक्सर कुछ गुणी लोगों लोगों यथा हरिवंश जी,दर्शक जी,निराला जी,ईशान जी, राजलक्ष्मी जी को पढ़ा है,लेखकों के नाम तो अवश्य बदलतें रहे हैं, मगर मूल स्वर वही होता है सबका,जो अखबार का घोषित उद्देश्य है।गलत शासन का विरोध,गलत लोगों की आलोचना… अखबार का एक पन्ना भी अब धर्म- अध्यात्म एवम सन्त-महात्माओं के सुवचनों से पटा हुआ होता है मगर कहीं कुछ नहीं बदलता……कहीं कुछ बदलता नहीं दीख पड़ता……आखिर कारण क्या है इसका…??

    सौ-डेढ सौ साल पहले एक खास किस्म का वातावरण हुआ करता था इस देश में…वो बरस थे कठोर और यातनामयी गुलामी के बरस……मगर उस भीषण यातनादायक युग में भी चालीस करोड़ लोगों की लहरों के समन्दर में जो उफ़ान,जो उद्वेग,जो उबाल,जो जोश ठाठ मारता था और जो नेतृत्व उस वक्त उन्हें प्राप्त था उसमें जान पर खेलकर भी अपने देश की मुक्ति की भावना थी,इस भावना में एक निर्मल और मासूम प्रण था,गुलामी से मुक्ति का एक निश्चित उद्देश्य था,मुक्ति-पश्चात मिलने वाले देश को एक खास प्रकार से निर्मित करने की योजना थी……मगर वह संकल्प,वे योजनाएं आजादी के मिलते ही सत्ता-संघर्ष में अपहरण कर लिए गये……जबकि स्वाधीनता-सेनानियों ने मुक्ति-संग्राम में किये गये अपने संघर्षों के मुआवजे के रूप में सत्ता की कुर्सी चाही……और ना सिर्फ़ चाही…बल्कि उसके लिए भी जो घमासान लड़ा गया…उसने स्वार्थपरता की सब हदों को तोड़ दिया……और देश के मुक्ति-संग्राम में जान-न्योछावर करने को तत्पर रहने वाले ये वीर-बांकुरे मुक्ति-पश्चात अपने किए गये कार्यों का मोल प्राप्त करने के चक्कर में आपस में ही कैसी-कैसी कटुताएं पाल बैठे……यह एक किस्म का अपहरण कांड था,जिसमें किसी भी किस्म की शुचिता नहीं थी बस अपने शरीर और मन को आराम देने की कुतित्स चाह थी यकायक उभर आयी इस चाह ने विकृतियों के ऐसे बीज सदा के लिए बो दिये कि मुक्ति-पश्चात देश को बनाने के समस्त स्वप्न और समुचे प्रण तिरोहित हो गये और इसी के साथ देश चल पड़ा अपने कर्णधारों की स्वार्थ-सिद्धि के एक ऐसे विकट रास्ते में जिसका अंत वर्तमान के रूप में ही होना था……यानि कि स्वार्थपरता की घोर पराकाष्ठा…… नीचता के पाताल तक की भयावह यात्रा……अब आज यह जो विरूपता का विशाल विष-वृक्ष हमें हमारे चारों ओर फ़ैला दिखायी दे रहा है……यह भी अभी आखिरी नहीं है,इसे तो अभी और बड़ा होना है……!!

    जब आप सेवा-समर्पण-क्रान्ति-त्याग करते हो तभी यह तय हो जाता है कि यह सब खुद के लिए नहीं कर रहे बल्कि अपने को समाज का एक विशिष्ठ हिस्सा समझ कर अपने हिस्से का विशिष्ठ पार्ट अदा कर रहे हो…कि आपने अगर यह नहीं किया तो आप अपनी ही नज़र से गिर जाओगे…बेशक आप खुद भी समाज की एक इकाई हो मगर इन कार्यों को किये जाते वक्त आपने एक सन्त की भांति ही निर्विकार होना होता है…देशीय-समुच्च्य के साथ एकाकार……!!जैसे ही आपने अपने कार्यों के प्रतिदान की मांग की…… बागडोर अपने हाथ में लेकर सत्ता का थोड़ा सुखपान/रसपान करने की इच्छा आपमें पैदा हुई नहीं कि फिर एक सिलसिला शुरू हो जाता है भोग का-आनन्द का-सुख के तिलिस्म का……और यह सब न सिर्फ़ आपको एक निम्नतम रास्ते की और अग्रसर कर देता है……बल्कि आपके चरित्र की उस विशिष्ठता को भी घुन की तरह खाना शुरू कर देता है जिसके कारण आप खुद को एक मिसाल बनाने के रास्ते की ओर अग्रसर हुए थे……जिसके कारण लोग आपको “विशेष” मानने लगे थे……जिसके कारण आपकी बोली का महत्व होने लगा था……जिसके कारण आप समाज के लीडर बनने लगे थे……!!

    सुख दरअसल एक ऐसी कामना है जो सदा और-और-और की डिमांड करती है…यह त्याग के बिल्कुल विपरीत है……और चरित्र की उदारता के बिल्कुल विलोम……और दुर्भाग्यवश हमारे मुक्ति-सेनानियों के त्याग के बाद भोग का रास्ता चुना……और ना सिर्फ़ इतना अपितु अपनी संतानों के भविष्य को भी सुनिश्चित कर देना चाहा……परिणाम सामने है…!!??शासन चलाने की अयोग्यता…अदूरदर्शिता…काहिली और अन्तत:लम्पटता से भरे लोग इस देश के शासन के उपरी तलों पर छा चुके हैं और आम जनता को इस सबसे बचने का कोई रास्ता ही नहीं दिखायी देता…जैसे एक अनन्त अंधेरा चारों ओर छाया हुआ है और नेतृत्व बिल्कुल रोशनी-विहीन…एकदम श्रीहीन…कान्तिहीन……बल्कि किसी गये-गुजरे से भी गया-गुजरा हुआ……सत्ता की चाह ने आजादी की शुरुआत में ही कुछ लोगों को शीर्ष पर लाकर उनसे भी गुणी लोगों को हाशिये पर डाल दिया था……कितने ही विरोधियों को मसल दिया गया था…और कितनों को मार भी डाला गया……समय एक दिन सबसे इन सबका हिसाब मांगेगा कि नहीं सो तो नहीं पता मगर यह तो तय है कि देश तो उसी वक्त जंगल बनाया जा चुका था……और जंगल के कानून भी उसी वक्त न्याय के शासन की जगह प्रत्यारोपित किए जा चुके थे……सत्ताधारी का सत्ता प्रेम देशप्रेम और विरोधियों का तर्क/बहस देशद्रोही साबित किये जाने लगे……!!

    झारखंड आज इस सबका एक अद्भुत-अतुलनीय-नायाब और खुबसुरत उदाहरण बनता जा रहा है, जहां सारे नियम,कानून,नैतिकता,शासन-कर्म सबके सब एकदम से ताक पर रखे जा चुके हैं और इन सबकी जगह व्यभिचार-लम्पटता……और संसार की सभी भाषाओं में जितने भी गंदगी के पर्याय-रूपी शब्द हैं,सब इस झारखंडी शासन व्यवस्था के विद्रूप के समक्ष एकदम बौने हैं(इसीलिये मैं इनके लिये इन तमाम शब्दों का प्रयोग नहीं कर पा रहा कि शब्द बिचारे क्या कहेंगे या कह पायेंगे जो इन झारखंडी नेताओं-अफ़सरों- ठेकेदारों और ना जाने किन-किन लोगों की चांडाल-चौकड़ियों ने कर दिखाया है……सच झारखंड आज “चुतियापे” की एक ऐसी भुतो-ना-भविष्यति वाली मिसाल बन चुका है कि इसकी आने वाली संताने इस बात पर भी कठिनता से विश्वास कर पायेंगी कि यहां अच्छे लोग भी कभी हुआ करते थे……कितना शर्मनाक है झारखंडी होना……इससे तो कहीं बहुत कम शर्मनाक था अपने घोरतम कुटिल-घटिया शासन वाले दिनों में बिहार……और जिस बिहार की तुच्छ राजनीति के कारण झारखंडी अस्मिता के लिए यह राज्य बुना गया……आज उसी तुच्छता की एकदम से घटिया से घटिया अनुकृति बन चुका है यह राज्य……!!

    किसी भी संस्थान/राज्य/देश को चलाने के लिए शासन की योग्यता के अलावा एक और खास बात की आवश्यकता होती है वो है इस समुचे वातावरण से अपनी निर्लिप्तता……क्योंकि केवल तभी लोभ-स्वार्थ या इस तरह की अन्य बातों से बचा भी जा सकता है……समुची लीडर-शिप एक समुचा रुपांतरण होता है खुद को न्याय की आग में झोंक में देने के माद्दे के रूप में……कैसा भी मोह आपने एक बार पाला तो उसे नासूर बनते देर नहीं लगती……समय रहते समस्याओं की पहचान भी आपके आने वाले संकटों को दूर कर सकती है……मगर यह सब कुछ आपमें मोह की अनुपस्थिति में ही संभव है,अन्यथा कभी नहीं…!!

    फिर एक बात और भी है कि जीवन में एक-एक डेग बढ़कर आप कुछ पाते हैं तो आप उस कुछ की कीमत भी जानते हैं मगर अचानक कुछ मिल जाने पर आदमी जैसे पागल हो जाता है ना वैसे झारखंडी नेता और उनकी चांडाल-चौकड़ी पगलाई हुई है……और वो किसी विक्षिप्त की भांति और-और-और इस तरह “सब कुछ” को अपनी अंटी में धर लेने को आतूर है……सब कुछ लूट लेने को हवशी है……उसे इस पागलपन के सिवा कुछ और नज़र ही नहीं आता…इसलिए बाहर से देखने पर इस तन्त्र में मल-मूत्र-विष्ठा-गंदगी और वीभत्सतता के अलावा कुछ दिखायी नहीं देता……इस चौकड़ी का प्रत्येक व्यवहार एक दंभ,एक सनक,एक अहंकार,एक क्रपणता,एक अहनमन्यता और यहां तक कि एक राक्षसी वृत्ति बन चुका है जो सबको हजम कर लेना चाहता है……!!

    झारखंड को बनाने की लड़ाई में अपना सब-कुछ त्याग कर जंगल-जंगल घूम कर भूखे-प्यासे भी रहकर गुरुजी की उपाधि पाने वाले महापुरुष तक भी अपना समुचा “सत”इसी लोभी सत्ता की चाह में खोकर अपना समस्त “चरित्र” खोकर लुट-पिटा कर एक निस्तेज और बिल्कुल एक लम्पट आम और नौसुखिये नेता की तरह बर्ताव कर रहे हैं……कल को कोई पूछे अगर कि झारखंड में “गुरुजी” किनको कहा जाता था…तो हमारे बच्चे भला क्या जवाब देंगे……यह सोचकर भी कोफ़्त होती है……यह झारखंड का एक सबसे बड़ा का दर्द है……काश कि इसे “गुरुजी” खुद या उनकी कोई संताने पह्चानें……बेशक कोई व्यक्ति एक जान लड़ा देने वाला समर्पित सेनानी हो सकता है मगर यह कतई अनिवार्य नहीं कि वो एक बेहतर शासनकर्ता भी साबित हो……क्रान्ति की आग कोई और ही बात होती है साथ ही शासन चलाने की योग्यता एवम दूरदर्शिता एक बिल्कुल अलग और दूसरी ही बात……क्रान्तिधर्मिता का प्रबन्धन और शासन का प्रबन्ध भी इसी तरह दो अलग-अलग चीज़ें हैं। और जरूरी नहीं कि कोई एक इन्सान दोनों ही बातों में होशियार हो……हो भी सकता है और नहीं भी……!!

    किन्तु यह हश्र भी तो कमोबेश सभी जगह दीख पड़ रहा है,कहीं कम तो कहीं ज्यादा……63 सालों में घोटालों में गयी कुल रकम शायद देश के विकास में खर्च की जाने वाली रकम से ज्यादा ही बैठेगी तिस पर गिरते चरित्र का मुल्यांकन करें तो देश को हुआ नुकसान अत्यन्त भयावह मालूम प्रतीत होगा…शायद चरित्र नाम की कोई वस्तु का अस्तित्व ही नहीं बचा है अब…आने वाली पीढी को यह समझा पाना भी कठिन होगा कि शब्दकोष में इस नाम का भी एक शब्द हुआ करता था…जिसका अर्थ फलां-फलां था मैं सोच रहा हूं क्या उपमा से इसे चिन्हित किया जायेगा…!!अगर समाज का कोई भी सदस्य यह सोचना तक छोड़ दे कि मेरा चरित्र भी कायम रह जाये…और समाज का सिर भी गर्व से उन्नत हो जाये…तो फिर समाज का क्या होगा…??क्योंकि आखिरकार सारी चीज़ें तो पहले कल्पना में ही आती हैं साकार तो आदमी उन्हें बाद में करता है…और विवाद भी बाद की ही बात है…मगर कहीं कोई कल्पना-प्रश्न-विचार-कर्म ऐसा कुछ भी नहीं तो फिर क्या हो…किसी प्रकार की कोई गति हो तब ना आगा या पीछा हो…!!

    और झारखंड की जनता……जिसने मल-मुत्र-विष्ठा और गन्दगी में रहने को ही अपनी नियति मान लिया है तो फिर उसे इस पतन से बाहर भी कौन निकाल सकता है,कोई उपर से थोड़ा ना आता है कोई सुरते-हाल बदलने के लिए……खुद समाज को ही उठ खड़ा होना होता है……मगर यहां तो बोलने वाले बोल रहे हैं,लिखने वाले लिख रहे हैं और मीडिया के विरोध के तमाम स्वरों के बावजूद भी नोचने वाले जी भर-भर कर राज्य का सब कुछ नोच रहे हैं,व्यवस्था का चीरहरण कर रहे हैं और लोकतंत्र के साथ अमानुषिक गैंगरेप……!!……देशद्रोही होने की हद तक कमीनापन तारी है जिनपर……और देशद्रोही कहे जाने पर आसमान सर पर उठा लेने वाले…कुत्तों से गये गुजरे हुए जा रहे हैं(सारी कुत्तों मैं आपकी वफ़ादारी की तुलना एक निहायत ही धोखेबाज जीव से कर रहा हूं)और कुत्तों की टेढी पूंछ से तुलना करने पर संसद तक भंग कर देते हैं…सड़कों पर तांडव मचा रहे हैं…चैनलों पर हो-हल्ला कर रहे हैं…निजी अहंकार का वीभत्स रूप हैं ये लोग……सत्ता…सुरा…सुन्दरी…सम्पत्ति…बस यही ध्येय है जिनका……जिसे वे अपने मातहतों…सम्बंधियों …दोस्तों की चांडाल-चौकड़ी की मदद से घृणिततम रूपों से पूरा कर रहे हैं……और इन शैतानों को…इन राक्षसों को…प्रकारांतर से हरामखोरों को…देशद्रोहियों को जनता ढो रही है…ढोए ही जा रही है…और यहां तक कि इन्हीं हरामखोरों को जीता-जीता कर फिर-फिर-फिर से संसद और विधानसभा भेजे जा रही है…मेलों-ठेलों और जुलुसों की शक्ल में…हर जगह कोई ढपोरशंख कोई ना कोई महत्वपूर्ण पद संभाले हुए है…गठबंधनों ने सबकी चांदी कर दी है……जिसकी कोई औकात नहीं है वह भी सबको ऐसा नचा रहा है कि भाग्य नामक चीज़ का अहसास होने लगा है…!!

    अब तो गोया किसी स्ट्रींग आपरेशन का भी कोई अर्थ नहीं दिखता…क्योंकि सब कुछ तो अब ऐसे खुले खाते की तरह होता है जैसे मानो किसी को किसी का कोई भय ही नहीं हो…जनता की आंखे और दिमाग का कैमरा एकदम से बन्द है…देश का एक वर्ग हरामखोरी की फ़सल से सुख-ऐशो-भोग के नशे में खो रहा है तो दूसरी ओर देश का हर बच्चा,जवान,प्रौढ और बूढ़ा बड़े मज़े-मज़े में चैन की नींद सो रहा है…जो शायद तब जागेगा तब जब इसके प्रत्येक सदस्य का घर-बार लुट-पिट चुका होगा…।इसकी सारी मां-बहनों-पत्नियों का बदन नुच चुका होगा…नग्न और बेसहारा औरतें अपने बदन पर गन्दे-से-गन्दे घृणिततम वीर्य के कतरे देखती हुई उबकाई रहेंगी मगर अब कोई ऐसा शिशु नहीं जनेगी जो देश की सोचता हो…देश के लिये रोता हो…देश के लिये सब कुछ करता हो…कि देश पर ही मर जाता होओ…!!!!
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